पति या पुत्र, पत्नी व पुत्री की लम्बी उम्र के लिए क्यों नहीं रखते व्रत?

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प्रेम और समर्पण की परम्परा में स्त्री-पुरुष समानता का सवाल।

रामाश्रय यादव

भारतीय समाज में षष्ठी (छठ-सूर्य उपासना) करवाचौथ, जीउतपुत्रिका, माघी चौथ, तीज, हरितालिका तीज,सोलह सोमवार,ललही छठ, वट सावित्री, मंगलवार व्रत, पुत्रदा एकादशी, अहोई अष्टमी, पुंसवन व्रत पर महिलाएं अपने पति-पुत्र की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।हरितालिका तीज और वट सावित्री जैसे पर्वों पर भी पति की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना की जाती है।इन परंपराओं को प्रेम, आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। लेकिन एक सवाल सहज ही उठता है-जब पत्नी-मां अपने पति-पुत्र की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती है, तो पति-पुत्र अपनी पत्नी-मां की दीर्घायु के लिए वैसा व्रत क्यों नहीं रखता?
क्या पति-पुत्र का जीवन पत्नी-मां से अधिक मूल्यवान है?क्या प्रेम और समर्पण की जिम्मेदारी केवल स्त्री की है? या फिर सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था ने पुरुष के अधिकारों को प्राथमिकता दिया है? जो एक पितृ-सत्ता को दर्शाता है?ये सवाल किसी धर्म या आस्था के विरोध में नहीं, बल्कि उन सामाजिक मान्यताओं पर विचार करने के लिए हैं,जिनमें स्त्री-पुरुष के लिए अलग-अलग अपेक्षाएं निर्धारित की गई हैं।
हमारे समाज में स्त्री को परिवार की खातिर त्याग करने और रिश्तों को प्राथमिकता देने की सीख दी जाती है।विवाह के बाद उससे पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखने और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करने की अपेक्षा की जाती है।इसके विपरीत, पति से पत्नी के लिए इसी प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान की अपेक्षा दिखाई देती है।यदि पत्नी का उपवास उसके प्रेम का प्रतीक है, तो पति का ऐसा करना प्रेम की अभिव्यक्ति क्यों नहीं हो सकता?क्या पुरुष का प्रेम केवल परिवार चलाने और आर्थिक जिम्मेदारियां निभाने तक सीमित है? स्त्री के स्वास्थ्य,सुख और लंबी उम्र की कामना करना उसके प्रेम और जिम्मेदारी का हिस्सा क्यों नहीं माना जाता?दरअसल,समस्या व्रत रखने या न रखने में नहीं, बल्कि उस सोच में है जो स्त्री के समर्पण को स्वाभाविक और पुरुष के समर्पण को वैकल्पिक मानती है।
विवाह दो व्यक्तियों की साझेदारी है।इसमें दोनों का जीवन, स्वास्थ्य, सम्मान और भविष्य समान रूप से महत्त्वपूर्ण होना चाहिए। पत्नी-मां केवल पति-पुत्र की लंबी उम्र की कामना करने वाली नहीं, बल्कि स्वयं भी स्वस्थ, सुखी और सम्मान जनक जीवन की अधिकारी है।यह सच है कि भारतीय परंपराओं में पत्नी के सुख और दीर्घायु की कामना करने वाली मान्यताएं पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हैं। अलग-अलग समुदायों में विभिन्न रीति-रिवाज प्रचलित हैं।फिर भी लोकप्रिय धार्मिक संस्कृति में पति की लंबी उम्र के लिए पत्नी के व्रत को जिस तरह प्रमुखता मिली है,वैसी पहचान पत्नी के लिए पति के व्रत को नहीं मिली।
जब दोनों एक-दूसरे के जीवनसाथी हैं,तो एक की लंबी उम्र के लिए उपवास करना प्रेम और दूसरे के लिए वैसा प्रयास न करना केवल परंपरा का विषय कैसे रह जाता है?यह तर्क दिया जा सकता है कि करवाचौथ और तीज महिलाओं की आस्था से जुड़े पर्व हैं तथा पुरुषों के लिए ऐसे व्रत की कोई अनिवार्यता नहीं है।यह सही है कि प्रत्येक परंपरा में दोनों की भूमिका समान होना जरूरी नहीं।लेकिन जब किसी परंपरा को प्रेम और समर्पण का आदर्श बताया जाता है,तो उसमें पारस्परिकता का प्रश्न उठना भी स्वाभाविक है। समानता का अर्थ पुरुषों को भी उपवास के लिए बाध्य करना नहीं है।किसी व्यक्ति के प्रेम को भूखे-प्यासे रहने से मापना भी उचित नहीं। पत्नी अपनी आस्था के अनुसार व्रत रखे या न रखे, यह उसकी स्वतंत्रता होनी चाहिए। उसी तरह पति अपनी पत्नी के लिए व्रत रखे, प्रार्थना करे या उसके स्वास्थ्य और खुशहाली का ध्यान रखे-प्रेम व्यक्त करने के अनेक तरीके हो सकते हैं।महत्त्व इस बात का है कि दोनों एक-दूसरे की भावनाओं और निर्णयों का सम्मान करें।
समय के साथ समाज की सोच और पारिवारिक भूमिकाएं बदल रही हैं। महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं और पुरुष भी घर-परिवार की जिम्मेदारियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में दांपत्य संबंधों में भी समानता और पारस्परिक सम्मान का विस्तार होना चाहिए।करवाचौथ,हरीतालिका तीज पर पत्नी पति की दीर्घायु की कामना करे,तो पति भी उसकी लंबी और स्वस्थ जिंदगी के लिए प्रार्थना करें।दोनों एक-दूसरे के लिए व्रत रखें।किसी भी स्थिति में एक की आस्था दूसरे पर थोपी नहीं जानी चाहिए। परंपराएं हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं, लेकिन उनका उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए।समय के साथ उनकी व्याख्या में समानता और मानवीय संवेदना को स्थान देना परंपरा का अपमान नहीं,बल्कि उसे अधिक समावेशी बनाना है।
सवाल परंपरा से नहीं, दोहरे मापदंड से है आखिर सवाल यह नहीं है कि पुरुष करवाचौथ,तीज या जिउत पुत्रिका क्यों नहीं मनाते। असली सवाल यह है कि पत्नी के त्याग को प्रेम का प्रमाण मानने वाली सामाजिक सोच पति के समान समर्पण को उतनी प्रमुखता क्यों नहीं देती?
पति-पुत्र की दीर्घायु के लिए पत्नी-मां का व्रत यदि प्रेम है,तो पत्नी-मां की दीर्घायु के लिए पति-पुत्र की प्रार्थना भी प्रेम ही है।दोनों के जीवन का मूल्य समान है, इसलिए एक-दूसरे के प्रति चिंता और जिम्मेदारी भी पारस्परिक होनी चाहिए।दांपत्य का अर्थ यह नहीं कि एक व्यक्ति त्याग करता रहे और दूसरा उसे स्वीकार करता रहे।उसका वास्तविक अर्थ है-दोनों एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनें, स्वास्थ्य का ध्यान रखें और जीवन को समान रूप से महत्त्व दें। परंपराओं का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन उनके साथ जुड़े सामाजिक प्रश्नों पर विचार करना भी जरूरी है।सच्चा प्रेम किसी एक के त्याग से नहीं, बल्कि दोनों के पारस्परिक सम्मान, विश्वास और संवेदनशीलता से पूर्ण होता है।
(लेखक : सामाजिक विचारक है)

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