डॉ तबस्सुम जहां

एक बार फिर वेबसीरीज़ ‘दुपहिया’ दर्शकों की धड़कन गुदगुदाने, धड़कपुर और उसके चिर-परिचित गाँववालों के साथ लौट आई है। मगर इस बार दुपहिया अकेली नहीं है। अपनी पिछली सीट पर वह गाँव और समाज से जुड़े कई सामाजिक, शैक्षिक और समसामयिक मुद्दों को साथ लेकर आई है। देसी हास्य और सहज भाषा में कही गई कहानी विकास बनाम अंधविश्वास, बेरोज़गारी, शिक्षा, ग्रामीण राजनीति और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार जैसे सवालों को मनोरंजन के साथ सामने रखती है। सोनम नायर के निर्देशन में और सलोना बैंस जोशी व शुभ शिवदासानी के बॉम्बे फिल्म कार्टेल एलएलपी के बैनर तले बनी ‘दुपहिया 2’ ग्रामीण जीवन की सहजता, हास्य और सामाजिक सरोकारों को एक दिलचस्प कथानक में पिरोती है।
जिस कहानी की शुरुआत गाँव में दहेज में दुपहिया देने से होती है, वही दुपहिया सीज़न 2 में गाँव की राजनीति, रोशनी के संघर्ष और उसके SSC परीक्षा पास करने की चुनौती तक पहुँचती है। गाँव की बंजर ज़मीन पर मोबाइल टावर लगाया जाना कहानी को एक और दिलचस्प मोड़ देता है। टावर के फायदे-नुकसान, उसकी किरणों को लेकर फैली अफ़वाहें, व्यक्तिगत ईर्ष्या और बेरोज़गार मास्टर की अपनी ज़मीन पर टावर लगवाने की जोड़-तोड़ ग्रामीण समाज में विकास और अंधविश्वास के टकराव को सामने लाती है। आगे कहानी अकादमिक जगत, शिक्षा विभाग और पुलिस-प्रशासन की मिलीभगत से चल रहे फर्जी मेडिकल डिग्री, पेपर लीक और डॉक्टरों के कारोबार तक पहुँचती है। इतने सारे मुद्दों को एक साथ समेटना सीरीज़ की खूबी भी है और उसकी सीमा भी। कई सामाजिक विषयों को छू लेने के कारण कथा कहीं-कहीं तेजी से एक मुद्दे से दूसरे मुद्दे की ओर बढ़ती है और कुछ प्रसंगों का थोड़ा और विस्तार दिया जा सकता था।

अभिनय की बात करें तो मिथिलेश ठाकुर के रूप में यशपाल शर्मा इस बार पिछली सीरीज़ के मुकाबले बिल्कुल अलग और सकारात्मक अवतार में नज़र आते हैं। एक ‘सुपर कॉप’ के रूप में उनकी सहज और प्रभावशाली अदाकारी दर्शकों की सहानुभूति और अंत में तालियाँ दोनों बटोरती है। आला अधिकारी भले ही उनकी मेहनत का श्रेय ले जाएँ, लेकिन अपने सीनियर का मन और पक्ष बदलने में वह सफल होते हैं। बहादुर पुलिस दरोगा के साथ अच्छे सीनियर, पति और जिम्मेदार नागरिक के किरदार को उन्होंने विश्वसनीयता के साथ निभाया है।
बनवारी झा उर्फ गजराज राव की अब तक चली आ रही ईमानदार मास्टर की छवि इस बार बदलती दिखाई देती है। बेरोज़गारी से जूझ रहे मास्टर मोबाइल टावर को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का अवसर मानते हैं और उसे हासिल करने के लिए जोड़-तोड़ से भी पीछे नहीं हटते। गजराज राव ने किरदार के इस स्वार्थ और मानसिक द्वंद्व को सहज अभिनय से उभारा है।

भूगोल यानी स्पर्श श्रीवास्तव अपने लौंडा नाच से वायरल हो चुका है, लेकिन उसका सपना उससे कहीं बड़ा है। विडंबना यह है कि अपने सपने को पूरा करने के लिए उसे किसी और का सपना पूरा करना होगा। इस विरोधाभास को किरदार हल्के हास्य और भावनात्मकता के साथ सामने लाता है। वहीं अमावस यानी भुवन अरोड़ा अब भी रोशनी के प्रेम में है और उसके एक फोन पर कुछ भी करने को तैयार है। शिवांगी बनी रोशनी के लिए SSC पास करना सिर्फ परीक्षा नहीं, बल्कि परिवार के सपने को पूरा करने और खुद को साबित करने की लड़ाई है। इन पात्रों की सहज अदाकारी कहानी के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देती है।
पुष्पलता यादव यानी रेणुका शहाणे अब सरपंच नहीं हैं और गाँव में अपना जनाधार बनाए रखने के लिए लगातार रणनीतिक पैतरेबाज़ी करती हैं। उनके हाव-भाव और संवाद-अदायगी किरदार की राजनीतिक चतुराई को प्रभावी ढंग से सामने लाते हैं। वहीं ज्ञान बुनियाद कोचिंग सेंटर के प्रथम बाबू (दिनेश लाल यादव, निरहुआ) का किरदार सीरीज़ में एक नया रंग भरता है। ज्ञान बुनियाद कोचिंग सेंटर चलाने और पैसे लेकर ‘पैकेज’ देने वाले इस किरदार की धमाकेदार एंट्री मनोरंजन के साथ उस शिक्षा व्यवस्था पर भी व्यंग्य करती है, जहाँ नकल, पेपर लीक के ज़रिए पढ़ाई कारोबार का रूप लेती दिखाई देती है।

जहाँ एक ओर ओटीटी प्लेटफॉर्म कहानी के नाम पर अश्लीलता, गाली-गलौज और हिंसा परोस रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ‘दुपहिया’ वेबसीरीज़ अपनी साफ-सुथरी छवि, अपने ग्रामीण अंचल और उसकी मिठास, आंचलिक लोकगीत-संगीत के साथ दर्शकों को भरपूर मनोरंजन कर रही है। वेबसीरीज़ का सबसे मज़बूत पक्ष इसके सभी पात्रों का लाजवाब, मँजा हुआ अभिनय, उनकी मनोदशा, तर्क-वितर्क तथा उनकी विडंबनाओं और विसंगतियों से उपजी कॉमेडी है, जो अपने हर संवाद, हर दृश्य से दर्शकों के मन को गुदगुदाने और खिलखिलाने पर मजबूर कर देती है। दूसरा मज़ेदार पक्ष है कि इसमें एक समस्या ख़त्म नहीं होती और दूसरी समस्या शुरू हो जाती है और दूसरी के बाद तीसरी। हर समस्या अपने साथ अनेक समस्याओं को न्यौता देती दिखाई देती है। कहानी अंततः वहीं लौटती है, जहाँ से शुरू हुई थी दुपहिया पर। इस तरह दुपहिया महज़ कहानी का हिस्सा नहीं रहती, बल्कि पूरी कथा को जोड़ने वाला प्रतीक बन जाती है। लेकिन ‘अंत भला तो सब भला’ के आधार पर अंत बहुत ही भावुक और सुखद होता है।
कुल मिलाकर, ‘दुपहिया 2’ अपनी देसी भाषा, हास्य, जीवंत पात्रों और सामाजिक सरोकारों के कारण दर्शकों से जुड़ती है। यह हर मुद्दे पर गहराई से नहीं ठहरती, लेकिन मनोरंजन के साथ कई ज़रूरी सवाल ज़रूर छोड़ जाती है। यही इस वेबसीरीज़ की सबसे बड़ी ताकत है यह हँसाते-गुदगुदाते हुए दर्शक को अपने आसपास की दुनिया पर सोचने के लिए मजबूर करती है।
