
गुवाहाटी। असम सरकार के हस्तताँत, वस्त्र और रेशम उद्योग मंत्री विश्वजीत दैमारी ने मंगलवार को असम के कामरूप जिले स्थित पारंपरिक वस्त्र नगरी शुवालकुछी के बाथान भाटिचुबा सार्वजनिक खेल मैदान में आयोजित एक भव्य समारोह में शिल्पिनियों को उन्नत गुणवत्ता वाले उरामाकोँ (हैंडलूम) तथा आधुनिक हस्तताँत उपकरणों का औपचारिक वितरण किया। यह वितरण भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के सहयोग से ‘राष्ट्रीय हस्तताँत विकास कार्यक्रम’ (NHDP) के तहत लागू ‘मेगा हैंडलूम क्लस्टर’ परियोजना के हिस्से के रूप में किया गया। समारोह में हाजो-शुवालकुछी विधानसभा क्षेत्र के विधायक प्रकाश चंद्र दास, हस्तताँत व वस्त्र संचालनालय की संचालक मयूरी ओजा, मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी हेमंत चौधुरी, कामरूप के अतिरिक्त आयुक्त गीताश्री लाचित , गुवाहाटी के शिल्पिनी सेवा केन्द्र की निदेशिका विशेष नटियाल, शुवालकुछी जिला परिषद सदस्य धीरज मोहंत, अतिरिक्त संचालक रणजीत डेका , सेवानिवृत्त अतिरिक्त संचालक नीरेन्द्र नाथ राना पाटगिरी सहित स्थानीय गणमान्य और सैकड़ों से भी अधिक शिल्पिनियाँ उपस्थित रहीं। मंत्री ने कहा कि शुवालकुछी की शिल्पिनियों की पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीक से जोड़कर हस्तताँत क्षेत्र को पूर्णतः आत्मनिर्भर बनाना इस मेगा परियोजना का लक्ष्य है। केंद्र व राज्य सरकार के संयुक्त प्रयास से लगभग 32.41 करोड़ के बजट में यह परियोजना प्रारम्भ की गई है। इसके तहत क्षेत्र के 5 ग्राम पंचायतों के 68 गांवों की कुल 4,266 लक्षित शिल्पिनियों को 100% कवरेज के साथ प्रत्येक को एक-एक उन्नत हैंडलूम प्रदान किए जाने का निर्णय लिया गया है। परियोजना में लोकनिर्माण विभाग की सहयोगिता से 4 कमन प्रोसेसिंग सेंटर (CPC), आधुनिक डाई हाउस, वस्त्र निर्माण यूनिट, तीन-हॉल वाली कम्प्यूटरीकृत डिज़ाइन स्टूडियो (CATD), विक्रय केंद्र, डिजिटल कार्ड-पंचिंग, आधुनिक सूत रंग केंद्र और 150 सीटों का आवासीय प्रबंध शामिल है। साथ ही स्थानीय उत्पादों को वैश्विक बाजार में ले जाने के लिए ‘हस्तताँत शॉपिंग प्लाज़ा’ और ई-मार्केटिंग व्यवस्था स्थापित की जाएगी। मंत्री ने उम्मीद जताई कि परियोजना के सफल क्रियान्वयन से शुवालकुछी में अभूतपूर्व आर्थिक परिवर्तन आएगा; शिल्पिनियों की दैनिक औसत आय वर्तमान की तुलना में दोगुनी होने की संभावना है तथा वार्षिक कार्यदिवस 225 से बढ़कर 305 दिन तक पहुंचने से शिल्पिनी समुदाय की स्थायी आजीविका सुनिश्चित होगी। इससे असम के पारंपरिक पाट-मुगा व घरेलू वस्त्रों का अंतरराष्ट्रीय निर्यात भी बढ़ने की संभावनाएं प्रबल होंगी।
