प्रो. बलराम सिंह सहित देश-विदेश के विद्वानों ने रामकथा के सांस्कृतिक महत्त्व और दोनों देशों के संबंधों पर रखे विचार।
नई दिल्ली। भारत और इंडोनेशिया के मध्य प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों तथा रामकथा की साझा विरासत पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “रामकथा: भारत और इंडोनेशिया की साझा सभ्यतागत विरासत” मंगलवार, 20 अक्टूबर को आयोजित हुई। संगोष्ठी का आयोजन काउंसिल ऑफ इंडिक स्टडीज़ एंड रिसर्च (सी.आई.एस.आर.), नई दिल्ली, इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइंसेज़ (इनैड्स), अमेरिका, यूनिवर्सिटास विजया कुसुमा सुरबाया, इंडोनेशिया तथा इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (आई.सी.सी.आर.), नई दिल्ली के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम प्रो. कौशल पंवार और डॉ. प्रमोद कुमार सिंह के संयोजन में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
कार्यक्रम के प्रारंभ में प्रो. कौशल पंवार ने कहा कि रामकथा धार्मिक आख्यान के साथ जीवन-मूल्यों और मानवीय संबंधों को समझने का माध्यम भी है। विजयादशमी के संदर्भ में उन्होंने भारत और इंडोनेशिया की सांस्कृतिक परंपराओं में रामकथा की भूमिका तथा साझा मूल्यों को शिक्षा और सांस्कृतिक सहयोग से जोड़ने पर बल दिया।
यूनिवर्सिटास विजया कुसुमा सुरबाया, इंडोनेशिया के समाजशास्त्र विभाग के डॉ. अब्दुस सैर ने इंडोनेशिया की कला, साहित्य और लोकपरंपराओं में रामकथा की उपस्थिति का उल्लेख किया। उन्होंने वायांग कठपुतली कला, मंदिरों की शिल्प परंपरा और बाली के केचक नृत्य को इसका उदाहरण बताते हुए कहा कि रामकथा इंडोनेशिया की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। इसमें निष्ठा, न्याय और सामुदायिक भावना जैसे मूल्य प्रमुख हैं। यूनिवर्सिटास विजया कुसुमा सुरबाया, इंडोनेशिया के इंग्लिश एजुकेशन स्टडी प्रोग्राम के प्रमुख डॉ. अमिरुद्दीन हादी विबोवो ने रामकथा को चरित्र-निर्माण और भाषा-शिक्षण से जोड़ने पर बल दिया। उन्होंने राम-सीता के प्रसंगों में प्रेम, निष्ठा और उत्तरदायित्व के मूल्यों तथा प्रम्बानन मंदिर और वायांग परंपरा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भाषा-शिक्षण में स्थानीय कथाओं और सांस्कृतिक उदाहरणों के समावेश से अंतर-सांस्कृतिक समझ बढ़ सकती है। उन्होंने संयुक्त शोध और अकादमिक संवाद को प्रोत्साहित करने की बात भी कही।
संगोष्ठी के अध्यक्ष एवं मुख्य वक्ता, इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइंसेज़ (इनैड्स), अमेरिका के अध्यक्ष प्रो. बलराम सिंह ने भारत और इंडोनेशिया के ऐतिहासिक सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र में प्राचीन काल से सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता रहा है और रामायण-महाभारत की परंपराएं दक्षिण-पूर्व एशिया की कला, संगीत, नृत्य और साहित्य में विविध रूपों में अभिव्यक्त हुई हैं। प्रो. सिंह ने कहा कि स्थानीय स्वरूपों में प्रस्तुत होने के बावजूद रामकथा त्याग, कर्तव्य, न्याय, संवेदनशीलता और सेवा जैसे मानवीय मूल्यों से जुड़ी रहती है। उन्होंने भारत और इंडोनेशिया की साझा सभ्यतागत विरासत को आपसी समझ और सहयोग का आधार बताते हुए विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने लाने के लिए संवाद, विचार-विमर्श और अकादमिक चर्चा को बढ़ावा देने पर बल दिया।
कार्यक्रम का संचालन काउंसिल ऑफ इंडिक स्टडीज़ एंड रिसर्च (सी.आई.एस.आर.) की भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रभाग की उपनिदेशक सुश्री प्रीति आनंद ने किया। धन्यवाद ज्ञापन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइंसेज़ (इनैड्स), डार्टमाउथ, अमेरिका के स्कूल ऑफ इंडिक स्टडीज़ में एडजंक्ट प्रोफेसर डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने प्रस्तुत किया। डॉ. सिंह मैत्रेयी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय के विदुषी अरुंधती सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम्स के नोडल अधिकारी एवं समन्वयक भी हैं। उन्होंने मुख्य वक्ता, सभी वक्ताओं, सहयोगी संस्थानों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह संगोष्ठी भारत और इंडोनेशिया के बीच रामकथा, भारतीय ज्ञान परंपरा और साझा सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में शैक्षणिक संवाद तथा सहयोग को नई दिशा प्रदान करेगी। गौरतलब है कि इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में भारत, इंडोनेशिया और अमेरिका सहित विभिन्न देशों से 160 से अधिक प्रतिभागियों ने सहभागिता की।
